Sunder Kand In Hindi | Sundar Kand Full Hindi Text | Sunder Kand Hindi Lyrics

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SunderKand

 

 

शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजीसे निरन्तर सेवित, वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, सर्वव्यापक, देवताओंमें सबसे बड़े, मायासे मनुष्यरूपमें दीखनेवाले, समस्त पापोंको हरनेवाले, करुणाकी खान, रघुकुलमें श्रेष्ठ तथा राजाओंके शिरोमणि, राम कहलानेवाले जगदीश्वरकी में वन्दना करता हूँ॥ १ ॥

 

हे रघुनाथ जी! मैं सत्य कहता हूँ और आप सबके अंतर्यामी हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है।

हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भर (पूर्ण) भक्ति दीजिए और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिए। (2)

 

 

अतुल बलके धाम, सोनेके पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [ को ध्वंस करने] के लिये अग्निरूप, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणोंके निधान, वानरोंके स्वामी श्रीरघुनाथजीके प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान्जी को मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३ ॥

 

जाम्बवान्‌के सुन्दर वचन सुनकर हनुमान्जीके हृदयको बहुत ही भाये [वे बोले-] हे भाई! तुमलोग दुःख सहकर, कन्द- मूल फल खाकर तबतक मेरी राह देखना ॥ १ ॥

 

जबतक मैं सीताजीको देखकर [लौट] न आऊँ काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदयमें श्रीरघुनाथजीको धारण करके हनुमान्जी हर्षित होकर चले ॥ २ ॥

 

 

समुद्रके तीरपर एक सुन्दर पर्वत था। हनुमान्जी खेलसे ही (अनायास ही) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार श्रीरघुवीरका स्मरण करके अत्यन्त बलवान् हनुमान्जी उसपरसे बड़े वेगसे उछले ॥ ३ ॥

 

जिस पर्वतपर हनुमानजी पैर रखकर चले (जिसपरसे वे उछले), वह तुरंत ही पातालमें भैंस गया। जैसे श्रीरघुनाथजीका अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमानजी चले ॥ ४ ॥

 

समुद्रने उन्हें श्रीरघुनाथजीका दूत समझकर मैनाक पर्वतसे कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करनेवाला हो (अर्थात् अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे ) ॥ ५ ॥

 

                                                                    [दोहा १]

 

हनुमान्जीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा- भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ ? ॥ १ ॥

 

देवताओं ने पवनपुत्र हनुमान्जीको जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल - बुद्धिको जाननेके लिये ( परीक्षार्थ) उन्होंने सुरसा नामक सपकी माता को भेजा, उसने आकर हनुमान्जीसे यह बात कही - ॥ १ ॥

 

आज देवताओंने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमान्जीने कहा— श्रीरामजीका कार्य करके मैं लौट आऊँ और सीताजीकी खबर प्रभुको सुना दूँ ॥ २ ॥

 

 

तब मैं आकर तुम्हारे मुँहमें घुस जाऊँगा [तुम मुझे खा लेना]। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपायसे उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान्जीने कहा – तो फिर मुझे खा न ले ॥३॥

 

उसने योजनभर (चार कोसमें) मुँह फैलाया। तब हनुमान्जीने अपने शरीरको उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजनका मुख किया। हनुमान्जी तुरंत ही बत्तीस योजनके हो गये ॥ ४ ॥

 

जैसे-जैसे सुरसा मुखका विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान्जी उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन (चार सौ कोस का) मुख किया। तब हनुमान्जीने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया ॥ ५॥

 

और वे उसके मुखमें घुसकर [तुरंत ] फिर बाहर निकल आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। [ उसने कहा-] मैंने तुम्हारे बुद्धि-बलका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओं ने मुझे भेजा था ॥ ६ ॥

[दोहा २]

 

तुम श्रीरामचन्द्रजी का सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल- बुद्धिके भण्डार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब हनुमान्जी हर्षित होकर चले ॥ २ ॥

समुद्रमें एक राक्षसी रहती थी वह माया करके आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंको पकड़ लेती थी । आकाशमें जो जीव-जन्तु उड़ा करते थे, वह जलमें उनकी परछाई देखकर ॥ १ ॥

उस परछाईं को पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे [ और जलमें गिर पड़ते थे] इस प्रकार वह सदा आकाशमें उड़नेवाले जीवोंको खाया करती थी। उसने वही छल हनुमान्जी से भी किया। हनुमान्जी ने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया ॥ २ ॥

श्रीहनुमान्जी उसको मारकर समुद्रके पार गये। वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी। मधु (पुष्परस ) के लोभसे भरे गुञ्जार कर रहे थे ॥ ३ ॥

अनेकों प्रकार के वृक्ष फल-फूलसे शोभित हैं। पक्षी और पशुओंके समूह को देखकर तो वे मनमें [बहुत ही] प्रसन्न हुए। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमान्जी भय त्यागकर उसपर दौड़कर जा चढ़े ॥ ४ ॥

[शिवजी कहते हैं ] हे उमा ! इसमें वानर हनुमान्की कुछ बड़ाई नहीं है। यह प्रभुका प्रताप है, जो कालको भी खा जाता । पर्वतपर चढ़कर उन्होंने लङ्का देखी बहुत ही बड़ा किला है, कुछ कहा नहीं जाता ॥ ५ ॥

 

वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोने के परकोटे (चहारदीवारी) का परम प्रकाश हो रहा है ॥ ६ ॥

 

विचित्र मणियों से  जड़ा हुआ सोने का  परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं सुन्दर नगर बहुत प्रकारसे सजा हुआ है। हाथी, घोड़े, खच्चरोंके समूह तथा पैदल और रथोंके समूहोंको कौन गिन सकता है? अनेक रूपोंके राक्षसों के दल हैं, उनकी अत्यन्त बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती ॥ १ ॥

[छन्द २]

वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वोंकी कन्याएँ अपने सौन्दर्यसे मुनियोंके भी मनोंको मोहे लेती हैं। कहीं पर्वतके समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान् मल्ल (पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ोंमें बहुत प्रकार से भिड़ते और एक-दूसरे को ललकारते हैं॥ २ ॥

भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानी से ) नगरकी चारों दिशाओंमें (सब ओरसे) रखवाली करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे हैं। तुलसीदासने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके बाणरूपी तीर्थमें शरीरोंको त्यागकर परम गति पावेंगे ॥ ३ ॥

 

[दोहा ३]

 

नगरके बहुसंख्यक रखवालोंको देखकर हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धरूँ और रातके समय नगरमें प्रवेश करूं ॥ ३ ॥

हनुमान्जी मच्छरके समान ( छोटा-सा ) रूप धारण कर नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके लङ्काको चले। [लङ्काके द्वारपर] लङ्किनी नामकी एक राक्षसी रहती थी। बोली- मेरा निरादर करके ( बिना मुझसे पूछे ) कहाँ चला जा रहा है? ॥ १ ॥

 

हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना ? जहाँतक ( जितने ) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी ॥ २ ॥

 

वह लङ्किनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [ वह बोली- ] रावणको जब ब्रह्मा जी ने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसों के विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि - ॥ ३॥

 

जब तू बंदरके मारनेसे व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसोंका संहार हुआ जान लेना । हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मँ श्रीरामचन्द्रजीके दूत (आप) को नेत्रोंसे देख पायी ॥ ४ ॥

 

                                                            [दोहा ४]

हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक पलड़े में रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [ दूसरे पलड़ेपर रखे हुए ] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) - मात्रके सत्सङ्गसे होता है ॥ ४ ॥

 

अयोध्यापुरी के राजा श्रीरघुनाथजी को हृदयमें रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिये उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गायके खुरके बराबर हो जाता है, अग्निमें शीतलता आ जाती है ॥ १॥

और हे गरुड़जी! सुमेरु पर्वत उसके लिये रजके समान हो जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने एक बार कृपा करके देख लिया । तब हनुमानजीने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान्‌का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया ॥ २ ॥

उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महलकी खोज की। जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे। फिर वे रावणके महलमें गये। वह अत्यन्त विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता ॥ ३ ॥

हनुमानजी ने उस (रावण) को शयन किये देखा; परन्तु महल में जानकी जी नहीं दिखायी दीं फिर एक सुन्दर महल दिखायी दिया। वहाँ (उसमें) भगवान्‌का एक अलग मन्दिर बना हुआ था ॥ ४ ॥

                                                         [दोहा ५]

वह महल श्रीरामजीके आयुध (धनुष-बाण) के चिह्नोंसे अङ्कित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन- नवीन तुलसी के वृक्ष समूहोंको देखकर कपिराज श्री हनुमान्जी हर्षित हुए ॥ ५ ॥

लङ्का तो राक्षसोंके समूहका निवासस्थान है। यहाँ सज्जन (साधु पुरुष ) - का निवास कहाँ? हनुमान्जी मन में इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे ॥ १ ॥

उन्होंने (विभीषणने) रामनामका स्मरण (उच्चारण) किया। हनुमान्जीने उन्हें सज्जन जाना और हृदयमें हर्षित हुए। [ हनुमान्जीने विचार किया कि ] इनसे हठ करके (अपनी ओरसे ही ) परिचय करूँगा, क्योकि साधुसे कार्यकी हानि नहीं होती [ प्रत्युत लाभ ही होता है ] ॥ २ ॥

ब्राह्मण का रूप धरकर हनुमानजीने उन्हें वचन सुनाये ( पुकारा)। सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आये। प्रणाम करके कुशल पूछी [और कहा कि] हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा समझाकर कहिये ॥ ३ ॥

 

क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदयमें अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है अथवा क्या आप दीनों  से प्रेम करनेवाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने (घर बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं ? ॥ ४ ॥

 

                                                         [दोहा ६]

तब हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीकी सारी कथा कहकर अपना नाम बताया। सुनते ही दोनोंके शरीर पुलकित हो गये और श्रीरामजीके गुणसमूहोंका स्मरण करके दोनोंके मन [प्रेम और आनन्दमें] मग्न हो गये ॥ ६ ॥

[विभीषणजीने कहा-] हे पवनपुत्र ! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतोंके बीचमें बेचारी जीभ हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुलके नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी मुझपर कृपा करेंगे

मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होनेसे साधन तो कुछ बनता नहीं और न मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें प्रेम ही है। परन्तु हे हनुमान् ! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजीकी मुझपर कृपा क्योंकि हरिकी कृपाके बिना संत नहीं मिलते॥ २ ॥

जब श्रीरघुवीरने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओरसे) दर्शन दिये हैं। [हनुमानजीने कहा-] हे विभीषणजी! सुनिये, प्रभुकी यही रीति है कि वे सेवकपर सदा ही प्रेम किया करते हैं ॥ ३ ॥

भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? [जातिका ] चञ्चल वानर हूँ और सब प्रकारसे नीच हूँ। प्रातः काल जो हमलोगों ( बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिने उसे भोजन न मिले ॥ ४ ॥

हे सखा ! सुनिये, मैं ऐसा अथम हूँ पर श्रीरामचन्द्रजीने तो मुझपर भी कृपा ही की है। भगवान्के गुणोंका स्मरण करके हनुमान्जीके दोनों नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया ॥ ७ ॥

 

जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी ( श्रीरघुनाथजी) को भुलाकर [विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुःखी क्यों न हों ? इस प्रकार श्रीरामजी के गुण समूहों को कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की ॥ १ ॥

फिर विभीषणजीने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहाँ (लङ्कामें) रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमान्जीने कहा- हे भाई! सुनो, मैं जानकी माताको देखना चाहता हूँ ॥ २ ॥

विभीषणजीने [माताके दर्शनकी] सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनायीं तब हनुमानजी विदा लेकर चले। फिर वही ( पहलेका मसक सरीखा रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें (बनके जिस भागमें) सीताजी रहती थीं ॥ ३

सीताजीको देखकर हनुमानजीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया। उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी (लट) है। हृदय में श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहाँका जाप (स्मरण) करती रहती हैं ॥ ४ ॥

                                                                [दोहा ८]

 

श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं (नीचेकी ओर देख रही हैं) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है। जानकीजीको दीन (दुःखी) देखकर पवनपुत्र हनुमान्जी बहुत दुःखी हुए ॥ ८ ॥

 

हनुमान्जी वृक्षके पत्तोंमें छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ ? उसी समय बहुत सी स्त्रियोंको साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया ॥ १ ॥

उस दुष्टने सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाया साम, दान, भय और भेद दिखलाया। रावणने कहा हे सुमुखि ! हे सयानी ! सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियोंको — ॥ २ ॥

मैं तुम्हारी दासी बना दूंगा, यह मेरा प्रण है तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ (परदा) करके कहने लगीं ॥३॥

हे दशमुख सुन, जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकी जी फिर कहती हैं- तू [ अपने लिये भी] ऐसा ही मनमें समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीरके बाणकी खबर नहीं है ॥ ४ ॥

पापी! तू मुझे सूनेमें हर लाया है। रे अधम ! निर्लज्ज ! तुझे लज्जा नहीं आती ? ॥ ५ ॥

 

                                                                 [दोहा ९]

अपनेको जुगनूके समान और रामचन्द्रजीको सूर्यके समान सुनकर और सीताजीके कठोर वचनोंको सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्से में आकर बोला- ॥९॥

सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाणसे काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान ले हे सुमुखि ! नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा ! ॥ १ ॥

[सीताजीने कहा-] हे दशग्रीव! प्रभुकी भुजा जो श्याम कमलकी मालाके समान सुन्दर और हाथीकी सूँड़के समान [ पुष्ट तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठमें पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही रे शठ सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है ॥ २ ॥

सीताजी कहती हैं है चन्द्रहास (तलवार) श्रीरघुनाथजीके विरहकी अग्निसे उत्पन्ना मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले । हे तलवार तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी धारा ठंडी और तेज हैं), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले ॥ ३ ॥

सीताजी के ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा तब मय दानव की पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया तब रावणने सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि जाकर सीताको बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ ॥ ४ ॥

यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा ॥ ५ ॥

 

                                                                                                                

 

                                 [दोहा १०]

 

[यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियोंके समूह बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे ॥ १० ॥

उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान) में निपुण थी। उसने सबको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा- सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो ॥ १ ॥

स्वप्नमें [मैंने देखा कि ] एक बंदरने लङ्का जला दी। राक्षसोंकी सारी सेना मार डाली गयी। रावण नंगा है और गदहेपर सवार है। उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं ॥ २ ॥

इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशा को जा रहा है और मानो लङ्का विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीता जीको बुला भेजा ॥ ३ ॥

मैं पुकारकर (निक्षपके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षासियाँ डर गयीं और जानकी जी के चरणों पर गिर पड़ीं ॥ ४ ॥

 

                                                                 [दोहा ११]

 

तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा ॥ ११ ॥

सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं- हे माता ! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता ॥ १॥

काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे है माता फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावण की शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानों से कौन सुने ? ॥ २ ॥

सीताजी के वचन सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया [उसने कहा-] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी ॥ ३ ॥

 

सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं - [ क्या करूँ ] विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पौड़ा मिटेगी। आकाशमें अंगारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी तारा नहीं आता ॥ ४ ॥

 

चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन ! मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक ] नाम सत्य कर ॥ ५ ॥

 

तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्निके समान हैं। अग्नि दे, विरह- रोगका अन्त मत कर (अर्थात् विरह रोगको बढ़ाकर सीमातक न पहुँचा)। सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमान्जीको कल्पकै समान बीता ॥ ६ ॥

[सोरठा १२]

तब हनुमान्जी ने हृदय में विचारकर [ सीताजीके सामने] अँगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अंगारा दे दिया। [यह समझकर ] सीताजी ने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया ॥ १२ ॥

 

तब उन्होंने राम-नामसे अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठी को पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदय में अकुला उठीं ॥ १ ॥

 

 

[वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथ जी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और मायासे ऐसी ( मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान्जी मधुर वचन बोले - ॥ २ ॥

 

वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके ] सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥ ३ ॥

 

[सीताजी बोलीं- ] जिसने कानों के लिये अमृत रूप यह सुन्दर कथा कही वह हे भाई प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमानजी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गयीं उनके मनमें आश्चर्य हुआ ॥ ४ ॥

 

[हनुमानजीने कहा-] हे माता जानकी मैं श्रीरामजीका दूत हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है ॥ ५ ॥

 

[सीताजीने पूछा—] नर और वानरका सङ्ग कहो कैसे हुआ ? तब हनुमान्जी ने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही ॥ ६ ॥

                                                                    [दोहा १३]

हनुमान्जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजी के मनमें विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और वचनसे कृपासागर श्रीरघुनाथ जीका दास है ॥ १३ ॥

 

 

भगवान का जन (सेवक ) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी। नेत्रों में [प्रेमानुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया । [ सीताजीने कहा-] हे तात हनुमान् ! विरह सागरमें डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए॥ १ ॥

 

मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित खरके शत्रु सुखधाम प्रभुका कुशल- मङ्गल कहो। श्रीरघुनाथजी तो कोमलहृदय और कृपालु हैं। फिर है हनुमान् ! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है ? ॥ २ ॥

 

सेवकको सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथजी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले अङ्गोंको देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे ? ॥ ३ ॥

 

[मुँहसे ] वचन नहीं निकलता, नेत्रोंमें [विरहके आँसुओंका ] जल भर आया। [बड़े दुःखसे वे बोलीं- ] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया ! सीताजी को विरहसे परम व्याकुल देखकर हनुमानजी कोमल और विनीत वचन बोले - ॥ ४ ॥

 

हे माता ! सुन्दर कृपाके धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजीके सहित [ शरीरसे ] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःखसे दुःखी हैं। है माता ! मनमें ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये ) श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें आपसे दूना प्रेम है ॥ ५ ॥

        [दोहा १४]

 

राक्षसों के समूह पतंगों के समान और श्रीरघुनाथजी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता ! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसोंको जला ही समझो ॥ १५ ॥

 

श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी! रामबाण रूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है ? ॥ १ ॥

 

हे माता ! मैं आपको अभी यहाँ से लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्रजी की शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [अतः ] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो श्रीरामचन्द्रजी वानरों सहित यहाँ आवेंगे ॥ २

 

और राक्षसों को मारकर आपको ले जायेंगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [सीताजीने कहा-] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान ( नन्हें-नन्हें-से ) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं॥ ३॥

 

अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [ कि तुम जैसे बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमानजीने अपना शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेरु) के आकारका ( अत्यन्त विशाल ) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥ ४ ॥

 

 

तब (उसे देखकर) सीताजी के मन में विश्वास हुआ। हनुमानजीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ॥ ५ ॥

[दोहा १६]

हे माता ! सुनो, वानरोंमें बहुत बल बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्‌को मार सकता है ) ॥ १६ ॥

 

भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे सनी हुई हनुमान्जीकी वाणी सुनकर सीताजी के मनमें सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजीके प्रिय जानकर हनुमानजीको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शीलके निधान होओ ॥ १ ॥

 

हे पुत्र ! तुम अजर ( बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुमपर बहुत कृपा करें 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानोंसे सुनते ही हनुमान्जी पूर्ण प्रेममें मग्न हो गये ॥ २ ॥

 

हनुमान्जीने बार-बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा - हे माता ! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है ॥ ३ ॥

 

हे माता! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षोंको देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आयी है। [सीताजीने कहा-] हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं ॥ ४ ॥

 

[हनुमान्जीने कहा-] हे माता ! यदि आप मनमें सुख मानें (प्रसन्न होकर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है ॥ ५ ॥

 

हनुमानजी को बुद्धि और बलमें निपुण देखकर जानकीजीने कहा- जाओ हे तात! श्रीरघुनाथजीके चरणोंको हृदयमें धारण करके मीठे फल खाओ ॥ १७ ॥

 

वे सीताजी को सिर नवाकर चले और बागमें घुस गये। फल खाये और वृक्षोंको तोड़ने लगे। वहाँ बहुत से योद्धा रखवाले थे। उनमें से कुछको मार डाला और कुछने जाकर रावण से पुकार

की ॥१॥

[ और कहा-] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोकवारिका उजाड़ डाली फलं खाये, वृक्षोंको उखाड़ डाला और रखवालों को मसल मसलकर जमीनपर डाल दिया ॥ २ ॥

 

यह सुनकर रावणने बहुत से योद्धा भेजे उन्हें देखकर हनुमानजीने गर्जना की। हनुमानजीने सब राक्षसोंको मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये॥ ३ ॥

 

फिर रावण ने अक्षय कुमार को भेजा वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओंको साथ लेकर चला उसे आते देखकर हनुमानजीने एक वृक्ष [हाथमें] लेकर ललकारा और उसे मारकर महावनि (बड़े जोर) से गर्जना की ॥४॥

[दोहा १८]

 

उन्होंने सेना में कुछको मार डाला और कुछको मसल डाला और कुछको पकड़-पकड़कर धूलमें मिला दिया। कुछने फिर जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान् है ॥ १८ ॥

 

पुत्रका वथ सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने [अपने जेठे पुत्र] बलवान् मेघनाद को भेजा (उससे कहा कि) हे पुत्र मारना नहीं उसे बाँध लाना उस बंदरको देखा जाय कि कहाँ का है॥ १

 

 

इन्द्रको जीतने वाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाईका मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमानजीने देखा कि अब की भयानक योद्धा आया है तब वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े ॥ २ ॥

 

उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके प्रहारसे] लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया (रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े- बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान्जी अपने शरीर से मसलने लगे ॥ ३ ॥

 

उन सबको मारकर फिर मेघनाद से लड़ने लगे। [लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज ( श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये हों हनुमानजी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े। उसको क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी ॥ ४ ॥

 

फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे जीते नहीं जाते ॥ ५ ॥

[दोहा १९]

 

अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान (प्रयोग) किया, तब हनुमानजीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी ॥ १९ ॥

 

उसने हनुमानजीको ब्रह्मवाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्षसे नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान्जी मूच्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया ॥ १ ॥

 

[शिवजी कहते हैं ] हे भवानी सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धन को काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है ? किन्तु प्रभु के कार्य के लिये हनुमानजीने स्वयं अपनेको बँधा लिया ॥ २ ॥

 

बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये (तमाशा देखनेके लिये) सब सभामें आये। हनुमान्जीने जाकर रावणकी सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता ( ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती ॥ ३ ॥

 

देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत हुए सब रावण की भाँ ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं ।) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्जीके मनमें जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे, जैसे सर्पोंके समूहमें गरुड़ निःशङ्क (निर्भय) रहते हैं ॥ ४ ॥

[दोहा २०]

 

हनुमानजीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा । फिर पुत्र वधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया ॥ २० ॥

 

लङ्कापति रावणने कहा- रे वानर ! तू कौन है? किसके बलपर तूने वनको उजाड़कर नष्ट कर डाला ? क्या तूने कभी मुझे (मेरा नाम और यश ) कानोंसे नहीं सुना ? रे शठ ! मैं तुझे अत्यन्त निःशङ्क देख रहा हूँ ॥ १ ॥

 

 

तूने किस अपराध से राक्षसों को मारा? रे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जानेका भय नहीं है ? [हनुमान्जीने कहा-] हे रावण ! सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहों की रचना करती है; ॥ २ ॥

जिनके बलसे हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमश:) सृष्टिका सृजन पालन और संहार करते हैं जिनके बलसे सहस्रमुख (फणों) वाले शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्माण्डको सिरपर धारण करते हैं; ॥ ३ ॥

 

जो देवताओंकी रक्षाके लिये नाना प्रकारकी देह धारण करते हैं और जो तुम्हारे जैसे मूर्खोको शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ डाला और उसीके साथ राजाओंके समूहका गर्व चूर्ण कर दिया ॥ ४ ॥

 

जिन्होंने खर दूषण, त्रिशिरा और बालिको मार डाला, जो सब-के-सब अतुलनीय बलवान् थे; ॥ ५ ॥

                                 [दोहा २१]

 

जिनके लेशमात्र बलसे तुमने समस्त चराचर जगत्‌को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नीको तुम [ चोरीसे] हर लाये हो, मैं उन्हींका दूत हूँ ॥ २१ ॥

 

 

मैं तुम्हारी प्रभुताको खूब जानता हूँ, सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालिसे युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था। हनुमान्जीके [मार्मिक] वचन सुनकर रावणने हँसकर बात टाल दी ॥ १ ॥

 

[राक्षसोंके] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये ) मैंने फल खाये और वानर-स्वभावके कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरोंके) मालिक! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्गपर चलनेवाले (दुष्ट) राक्षस जब मुझे मारने लगे ॥ २ ॥

 

तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा उसपर तुम्हारे पुत्रने मुझको बाँध लिया। [किन्तु ] मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभुका कार्य किया चाहता हूँ ॥ ३ ॥

 

हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुलका विचार करके देखो और भ्रमको छोड़कर भक्तभयहारी भगवान्‌को भजो ॥ ४ ॥

 

जो देवता, राक्षस और समस्त चराचरको खा जाता है, वह काल भी जिनके डरसे अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न करो और मेरे कहनेसे जानकीजीको दे दो ॥ ५ ॥

[दोहा २२]

 

खर के शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतोंके रक्षक और दयाके समुद्र हैं। शरण जानेपर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरणमें रख लेंगे ॥ २२ ॥

 

तुम श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारण करो और लङ्काका अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजीका यश निर्मल चन्द्रमाके समान है। उस चन्द्रमामें तुम कलंक न बनो ॥ १ ॥

 

रामनामके बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोहको छोड़, विचारकर देखो। हे देवताओंके शत्रु ! सब गहनोंसे सजी हुई सुन्दरी स्त्री भी कपड़ोंके बिना (नंगी) शोभा नहीं पाती ॥ २ ॥

 

रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पानेके समान है। जिन नदियोंके मूलमें कोई जलस्रोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केवल बरसातका ही आसरा है) वे वर्षा बीत जानेपर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं ॥ ३ ॥

 

हे रावण ! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुखकी रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीरामजीके साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते ॥ ४ ॥

[दोहा २३]

 

मोह ही जिसका मूल है ऐसे ( अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ॥ २३ ॥

 

यद्यपि हनुमानजीने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीतिसे सनी हुई बहुत ही हितकी वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी रावण बहुत हँसकर (व्यंगसे) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला ! ॥ १

 

रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है। अधम ! मुझे शिक्षा देने चला है। हनुमान्जीने कहा- इससे उलटा ही होगा (अर्थात् मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं ) यह तेरा मतिभ्रम (बुद्धिका फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है ॥ २ ॥

 

हनुमान्जीके वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया [ और बोला – ] अरे ! इस मूर्खका प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर लेते ? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मन्त्रियोंके साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे ॥ ३ ॥

 

उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावणसे कहा कि दूतको मारना नहीं चाहिये, यह नीतिके विरुद्ध है। हे गोसाईं । कोई दूसरा दण्ड दिया जाय। सबने कहा- भाई! यह सलाह उत्तम है ॥ ४ ॥

 

यह सुनते ही रावण हँसकर बोला- अच्छा तो बंदरको अंग-भंग करके भेज ( लौटा ) दिया जाय ॥ ५ ॥

[दोहा २४]

 

मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदरकी ममता पूँछपर होती है। अतः तेलमें कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछमें बाँधकर फिर आग लगा दो ॥ २४ ॥

 

जब बिना पूँछका यह बंदर वहाँ (अपने स्वामीके पास) जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिकको साथ ले आयेगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता ( सामर्थ्य) तो देखूँ ! ॥ १ ॥

 

यह वचन सुनते ही हनुमानजी मनमें मुसकराये [ और मन- ही मन बोले कि ] मैं जान गया, सरस्वतीजी [इसे ऐसी बुद्धि देनेमें] सहायक हुई हैं। रावणके वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही (पूँछमें आग लगानेकी) तैयारी करने लगे ॥ २ ॥

 

[ पूँछके लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी तेल लगा कि ] नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया हनुमान्जीने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी ) । नगरवासी लोग तमाशा देखने आये। वे हनुमानजीको पैरसे ठोकर मारते हैं और उनकी बहुत हँसी करते हैं ॥ ३ ॥

 

ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं हनुमानजीको नगरमें फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी। अग्निको जलते हुए देखकर हनुमान्जी तुरंत ही बहुत छोटे रूपमें हो गये ॥ ४ ॥

 

बन्धनसे निकलकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े। उनको देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं ॥ ५ ॥

 

[दोहा २५]

 

उस समय भगवान्की प्रेरणासे उनचासों पवन चलने लगे। हनुमान्जी अट्टहास करके गर्जे और बढ़कर आकाशसे जा लगे ॥ २५ ॥

 

देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली) है। वे दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गये हैं। आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट

रही हैं ॥ १ ॥

 

हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसरपर हमें कौन बचावेगा ? [ चारों ओर ] यही पुकार सुनायी पड़ रही है। हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानरका रूप धरे कोई देवता है ! ॥२॥

 

साधुके अपमानका यह फल है कि नगर अनाथके नगरकी तरह जल रहा है। हनुमानजीने एक ही क्षणमें सारा नगर जला डाला। एक विभीषणका घर नहीं जलाया ॥ ३ ॥

 

[शिवजी कहते हैं- ] हे पार्वती ! जिन्होंने अग्निको बनाया, हनुमान्जी उन्हींके दूत हैं। इसी कारण वे अग्निसे नहीं जले। हनुमान्जीने उलट-पलटकर ( एक ओरसे दूसरी ओरतक) सारी लङ्का जला दी। फिर वे समुद्रमें कूद पड़े ॥ ४ ॥

 

[दोहा २६]

 

पूँछ बुझाकर थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप धारण कर हनुमानजी श्रीजानकीजीके सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए ॥ २६ ॥

 

[हनुमान्जीने कहा-] हे माता ! मुझे कोई चिह्न (पहचान ) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था। तब सीताजीने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्जीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया ॥ १ ॥

 

[ जानकीजीने कहा-] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना - हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकारसे पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकारकी कामना नहीं है),

तथापि दीनों (दुःखियों) ) पर दया करना आपका विरद है [ और मैं दीन हूँ] अतः उस विरदको याद करके हे नाथ! मेरे भारी संकटको दूर कीजिये ॥ २ ॥

 

हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्तकी कथा (घटना) सुनाना और प्रभुको उनके बाणका प्रताप समझाना [ स्मरण कराना ] । यदि महीनेभरमें नाथ न आये तो फिर मुझे जीती न पायेंगे ॥ ३ ॥

 

हे हनुमान् ! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जानेको कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात ! ॥ ४ ॥

 

[दोहा २७]

 

हनुमान्जीने जानकीजीको समझाकर बहुत प्रकारसे धीरज दिया और उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर श्रीरामजीके पास गमन किया ॥ २७ ॥

 

चलते समय उन्होंने महाध्वनिसे भारी गर्जन किया, जिसे सुनकर राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिरने लगे । समुद्र लाँघकर वे इस पार आये और उन्होंने वानरोंको किलकिला शब्द (हर्षध्वनि) सुनाया ॥ १ ॥

 

हनुमानजीको देखकर सब हर्षित हो गये और तब वानरोंने अपना नया जन्म समझा। हनुमान्जीका मुख प्रसन्न है और शरीरमें तेज विराजमान है, [ जिससे उन्होंने समझ लिया कि ] ये श्रीरामचन्द्रजीका कार्य कर आये हैं ॥ २ ॥

 

सब हनुमानजीसे मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछलीको जल मिल गया हो। सब हर्षित होकर नये-नये इतिहास ( वृत्तान्त) पूछते-कहते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥३॥

 

तब सब लोग मधुवनके भीतर आये और अंगदकी सम्मति से सबने मधुर फल [ या मधु और फल ] खाये। जब रखवाले बरजने लगे, तब घूँसोंकी मार मारते ही सब रखवाले भाग छूटे ॥ ४ ॥

 

[दोहा २८]

 

उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभुका कार्य कर आये हैं ॥ २८ ॥

 

यदि सीताजीकी खबर न पायी होती तो क्या वे मधुवनके फल खा सकते थे ? इस प्रकार राजा सुग्रीव मनमें विचार कर ही रहे थे कि समाजसहित वानर आ गये ॥ १ ॥

 

सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया । कपिराज सुग्रीव सभीसे बड़े प्रेमके साथ मिले। उन्होंने कुशल पूछी, [तब वानरोंने उत्तर दिया—] आपके चरणोंके दर्शनसे सब कुशल है। श्रीरामजीकी कृपासे विशेष कार्य हुआ (कार्यमें विशेष सफलता हुई है ) ॥ २ ॥

 

हे नाथ! हनुमान्ने ही सब कार्य किया और सब वानरोंके प्राण बचा लिये। यह सुनकर सुग्रीवजी हनुमानजीसे फिर मिले और सब वानरोंसमेत श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥ ३ ॥

 

श्रीरामजीने जब वानरोंको कार्य किये हुए आते देखा तब उनके मनमें विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिलापर बैठे थे। सब वानर जाकर उनके चरणोंपर गिर पड़े ॥ ४ ॥

 

[दोहा २९]

 

दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर मिले और कुशल पूछी। [वानरोंने कहा-] हे नाथ! आपके चरणकमलोंके दर्शन पानेसे अब कुशल है ॥ २९ ॥

 

जाम्बवान्ने कहा—हे रघुनाथजी ! सुनिये। हे नाथ! जिसपर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है । देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं ॥ १ ॥

 

वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणोंका समुद्र बन जाता है। उसीका सुन्दर यश तीनों लोकोंमें प्रकाशित होता है। प्रभुकी कृपासे सब कार्य हुआ। आज हमारा जन्म सफल हो

गया ॥ २ ॥

 

हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्ने जो करनी की, उसका हजार मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान्ने हनुमान्जीके सुन्दर चरित्र ( कार्य ) श्रीरघुनाथजीको सुनाये ॥ ३॥

 

[वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमान्जीको फिर हृदयसे लगा लिया और कहा- हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणोंकी रक्षा करती हैं ? ॥ ४ ॥

 

[दोहा ३०]

 

( हनुमानजीने कहा-) आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रोंको अपने चरणों में लगाये रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायँ तो किस मार्गसे ? ॥ ३० ॥

चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [ उतारकर ] दी। श्रीरघुनाथजीने उसे लेकर हृदयसे लगा लिया। [ हनुमान्जीने फिर कहा-] हे नाथ! दोनों नेत्रोंमें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ वचन कहे - ॥ १ ॥

 

छोटे भाईसमेत प्रभुके चरण पकड़ना [और कहना कि] आप दीनबन्धु हैं, शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले हैं और मैं मन, कर्म और वचनसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप) ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया ? ॥२॥

 

[हाँ] एक दोष मैं अपना [अवश्य] मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलने में हठपूर्वक बाधा देते हैं॥ ३ ॥

 

विरह अग्रि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार [अग्नि और पवनका संयोग होनेसे] यह शरीर क्षणमात्रमें जल सकता है। परन्तु नेत्र अपने हितके लिये (प्रभुका स्वरूप देखकर सुखी होनेके लिये) जल (आँसू बरसाते हैं, जिससे विरहको आगसे भी देह जलने नहीं पाती ॥ ४ ॥

 

सीताजीको विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! वह बिना कही ही अच्छी है (कहनेसे आपको बड़ा क्लेश होगा ) ॥ ५ ॥

 

[दोहा ३१]

 

हे करुणानिधान! उनका एक एक पल कल्पके समान बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके बलसे दुष्टोंके दलको जीतकर सीताजीको ले आइये ।। ३१ ।।

 

सीताजीका दुःख सुनकर सुखके धाम प्रभुके कमलनेत्रोंमें जल भर आया [ और वे बोले-] मन, शरीर और वचनसे जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रम) है, उसे क्या स्वप्रमें भी विपत्ति हो सकती है ? ॥ १ ॥

 

हनुमान्जीने कहा- हे प्रभो ! विपत्ति तो वही ( तभी ) है जब आपका भजन - स्मरण न हो। हे प्रभो! राक्षसोंकी बात ही कितनी है? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे ॥ २ ॥

 

[भगवान् कहने लगे—] हे हनुमान् ! सुन; तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा प्रत्युपकार (बदलेमें उपकार) तो क्या करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने नहीं हो सकता ॥ ३ ॥

 

हे पुत्र ! सुन; मैंने मनमें [ खूब] विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता। देवताओंके रक्षक प्रभु बार- बार हनुमान्जीको देख रहे हैं। नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल भरा है। और शरीर अत्यन्त पुलकित है ॥ ४ ॥

 

[दोहा ३२]

 

प्रभुके वचन सुनकर और उनके [प्रसन्न ] मुख तथा [पुलकित ] अंगोंको देखकर हनुमान्जी हर्षित हो गये और प्रेममें विकल होकर 'हे भगवन्! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े ॥ ३२ ॥

 

प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेममें डूबे हुए हनुमान्जीको चरणोंसे उठना सुहाता नहीं। प्रभुका कर-कमल हनुमान्जीके सिरपर है। उस स्थितिका स्मरण करके शिवजी प्रेममग्न हो गये ॥ १ ॥

 

फिर मनको सावधान करके शङ्करजी अत्यन्त सुन्दर कथा कहने लगे – हनुमानजीको उठाकर प्रभुने हृदयसे लगाया और हाथ पकड़कर अत्यन्त निकट बैठा लिया ॥ २ ॥

 

हे हनुमान् ! बताओ तो, रावणके द्वारा सुरक्षित लङ्का और उसके बड़े बाँके किलेको तुमने किस तरह जलाया ? हनुमान्जीने प्रभुको प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले - ॥ ३ ॥

 

बंदरका बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डालसे दूसरी डालपर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लाँघकर सोनेका नगर जलाया और राक्षसगणको मारकर अशोकवनको उजाड़ डाला ॥ ४ ॥

 

यह सब तो हे श्रीरघुनाथजी ! आपहीका प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता (बड़ाई) कुछ भी नहीं है ॥ ५ ॥

 

[दोहा ३३]

 

हे प्रभु! जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभावसे रूई [जो स्वयं बहुत जल्दी जल जानेवाली वस्तु है] बड़वानलको निश्चय ही जला सकती है। (अर्थात् असम्भव भी सम्भव हो सकता है ) ॥ ३३ ॥

 

हे नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिये। हनुमान्जीकी अत्यन्त सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा ॥ १ ॥

 

हे उमा ! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती ! यह स्वामी सेवकका संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी भक्ति पा गया ॥ २ ॥

प्रभुके वचन सुनकर वानरगण कहने लगे- कृपालु आनन्दकन्द श्रीरामजीकी जय हो, जय हो, जय हो ! तब श्रीरघुनाथजीने कपिराज सुग्रीवको बुलाया और कहा- चलनेकी तैयारी करो ॥ ३ ॥

 

अब विलम्ब किस कारण किया जाय? वानरोंको तुरंत आज्ञा दो। [ भगवान्‌ की] यह लीला ( रावणवधकी तैयारी ) देखकर बहुत से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाशसे अपने-अपने लोकको चले ॥ ४ ॥

 

[दोहा ३४]

 

वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही वानरोंको बुलाया, सेनापतियोंके समूह आ गये। वानर-भालुओंके झुंड अनेक रंगोंके हैं और उनमें अतुलनीय बल है ॥ ३४ ॥

 

वे प्रभुकेचरणकमलोंमें सिर नवाते हैं। महान् बलवान् रीछ और वानर गरज रहे हैं। श्रीरामजीने वानरोंकी सारी सेना देखी। तब कमलनेत्रोंसे कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली ॥ १ ॥

 

रामकृपाका बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गये। तब श्रीरामजीने हर्षित होकर प्रस्थान ( कूच किया। अनेक सुन्दर और शुभ शकुन हुए ॥ २ ॥

 

जिनकी कीर्ति सब मङ्गलोंसे पूर्ण है, उनके प्रस्थानके समय शकुन होना, यह नीति है ( लीलाकी मर्यादा है)। प्रभुका प्रस्थान जानकीजीने भी जान लिया। उनके बायें अङ्ग फड़क फड़ककर नानो कहे देते थे [कि श्रीरामजी आ रहे हैं] ॥ ३ ॥

 

जानकीजीको जो-जो शकुन होते थे, वही वही रावणके ब्लये अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं ॥ ४ ॥

 

नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार ( सर्वत्र बेरोक-टोक ) चलनेवाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षोंको धारण किये कोई आकाश मार्गसे और कोई पृथ्वीपर चले जा रहे हैं। वे सिंहके समान गर्जना कर रहे हैं [ उनके चलने और गर्जनेसे ] दिशाओं के हाथी विचलित होकर चिग्धाड़ रहे हैं ॥ ५ ॥

 

[छन्द १]

दिशाओंके हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत बञ्चल हो गये (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे । गन्धर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब के सब मनमें हर्षित हुए कि अब] हमारे दुःख टल गये। अनेकों करोड़ भयानक वानर द्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'प्रबल प्रताप कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहाँको गा रहे हैं ॥ १ ॥

[छन्द २]

उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्) सर्पराज शेषजी भी सेनाका बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते ( घबड़ा जाते हैं और पुनः पुनः कच्छपकी कठोर पीठको दाँतोंसे लकड़ते हैं। ऐसा करते ( अर्थात् बार-बार दाँतोंको गड़ाकर कच्छपकी पीठपर लकीर-सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे मानो श्रीरामचन्द्रजीकी सुन्दर प्रस्थानयात्राको परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथाको सर्पराज शेषजी कच्छपकी मीठपर लिख रहे हों ॥ २ ॥

 

इस प्रकार कृपानिधान श्रीरामजी समुद्रतटपर जा उतरे। अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे ॥ ३५ ॥

 

वहाँ (लङ्कामें) जबसे हनुमान्जी लङ्काको जलाकर गये, तबसे राक्षस भयभीत रहने लगे। अपने-अपने घरोंमें सब विचार करते हैं कि अब राक्षसकुलकी रक्षा [ का कोई उपाय ] नहीं है ॥ १ ॥

 

जिसके दूतका बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगरमें आनेपर कौन भलाई है ( हमलोगोंकी बड़ी बुरी दशा होगी) ? दूतियोंसे नगरनिवासियोंके वचन सुनकर मन्दोदरी बहुत ही व्याकुल हो गयी ॥ २ ॥

 

वह एकान्तमें हाथ जोड़कर पति (रावण) के चरणों लगी और नीतिरसमें पगी हुई वाणी बोली – हे प्रियतम ! श्रीहरिसे विरोध छोड़ दीजिये मेरे कहनेको अत्यन्त ही हितकर जानकर हृदयमें धारण कीजिये ॥ ३ ॥

 

जिनके दूतकी करनीका विचार करते ही (स्मरण आते ही) राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मन्त्रीको बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्रीको भेज दीजिये ॥ ४ ॥

 

सीता आपके कुलरूपी कमलोंके वनको दुःख देनेवाली जाड़ेकी रात्रिके समान आयी है। हे नाथ! सुनिये, सीताको दिये (लौटाये) बिना शम्भु और ब्रह्माके किये भी आपका भला नहीं हो सकता ॥ ५ ॥

                                

                                 [दोहा ३६]

 

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक । जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ॥ श्रीरामजीके बाण सर्पोंके समूहके समान हैं और राक्षसों के समूह मेढकके समान । जबतक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते (निगल नहीं जाते) तबतक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये ॥ ३६ ॥

 

मूर्ख और जगत्प्रसिद्ध अभिमानी रावण कानोंसे उसकी वाणी सुनकर खूब हँसा [ और बोला- ] स्त्रियोंका स्वभाव सचमुच ही बहुत डरपोक होता है। मङ्गलमें भी भय करती हो ! तुम्हार मन (हृदय) बहुत ही कच्चा ( कमजोर) है ॥ १ ॥

 

यदि वानरोंकी सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाक अपना जीवननिर्वाह करेंगे। लोकपाल भी जिसके डरसे काँपते हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसीकी बात है ॥ २ ॥

 

रावणने ऐसा कहकर हँसकर उसे हृदयसे लगा लिया और ममता बढ़ाकर (अधिक स्नेह दर्शाकर ) वह सभामें चला गया मन्दोदरी हृदयमें चिन्ता करने लगी कि पतिपर विधाता प्रतिकूल हो गये॥ ३ ॥

 

ज्यों ही वह सभामें जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पायी कि शत्रुकी सारी सेना समुद्रके उस पार आ गयी है। उसने मन्त्रियों से पूछा कि उचित सलाह कहिये [ अब क्या करना चाहिये ?] । तब वे सब हँसे और बोले कि चुप किये रहिये (इसमें सलाहकी कौन सी बात है ?) ॥ ४ ॥

 

आपने देवताओं और राक्षसोंको जीत लिया, तब तो कुछ श्रम ही नहीं हुआ। फिर मनुष्य और वानर किस गिनती हैं ? ॥ ५ ॥

 

                                 [दोहा ३७]

 

मन्त्री, वैद्य और गुरु- ये तीन यदि [अप्रसन्नताके] भय य [लाभकी] आशासे [हितकी बात न कहकर ] प्रिय बोलते हैं (ठकुरसुहाती कहने लगते हैं); तो [ क्रमशः ] राज्य, शरीर और धर्म- इन तीनका शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥ ३७ ॥

 

रावणके लिये भी वही सहायता (संयोग ) आ बनी है। मन्त्र उसे सुना-सुनाकर (मुँहपर) स्तुति करते हैं [ इसी समय ] अवसर जानकर विभीषणजी आये। उन्होंने बड़े भाईके चरणों सिर नवाया ॥ १ ॥

 

फिर वे सिर नवाकर अपने आसनपर बैठ गये और आज्ञ पाकर ये वचन बोले- हे कृपालु ! जब आपने मुझसे बात (राय) पूछी ही है तो हे तात! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार आपके हितकी बात कहता हूँ- ॥ २ ॥

 

जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकारके सुख चाहता हो, वह हे स्वामी! परस्त्रीके ललाटको चौथके चन्द्रमाकी तरह त्याग दे (अर्थात् जैसे लोग चौथके चन्द्रमाको नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्रीका मुख ही न देखे) ॥ ३ ॥

 

चौदहों भुवनोंका एक ही स्वामी हो, करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है) जो मनुष्य गुणों का समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो भी कोई भला नहीं कहता ॥ ४ ॥

 

                                 [दोहा ३८]

 

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ । सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत । हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ- ये सब नरकके रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं॥ ३८ ॥

 

हे तात! राम मनुष्योंके ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकोंके स्वामी और कालके भी काल हैं। वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञानके भण्डार] भगवान् हैं; वे निरामय (विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं ॥ १ ॥

 

उन कृपाके समुद्र भगवान्ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओंका हित करनेके लिये ही मनुष्य शरीर धारण किया है। हे भाई सुनिये, वे सेवकोंको आनन्द देनेवाले, दुष्टोंके समूहका नाश करनेवाले और वेद तथा धर्मकी रक्षा करनेवाले हैं ॥ २ ॥

 

वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइये। वे श्रीरघुनाथजी शरणागत का दुःख नाश करनेवाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेश्वर ) - को जानकीजी दे दीजिये और बिना ही कारण स्नेह करनेवाले श्रीरामजीको भजिये ॥ ३ ॥

 

जिसे सम्पूर्ण जगत्से द्रोह करनेका पाप लगा है, शरण जानेपर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों तापोंका नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूपमें प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदयमें यह समझ लीजिये ॥ ४ ॥

 

[दोहा ३९ (क)]

 

हे दशशीश! मैं बार-बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मदको त्यागकर आप कोसलपति श्रीरामजीका भजन कीजिये ॥ ३९ (क) ।

 

[दोहा ३९ (ख)]

 

मुनि पुलस्त्यजीने अपने शिष्यके हाथ यह बात कहला भेजी है। हे तात! सुन्दर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु (आप) से कह दी ॥ ३९ (ख) ॥

 

माल्यवान् नामका एक बहुत ही बुद्धिमान् मन्त्री था। उसने उन (विभीषण) के वचन सुनकर बहुत सुख माना [ और कहा-] हे तात! आपके छोटे भाई नीति-विभूषण ( नीति को भूषणरूपमें धारण करनेवाले अर्थात् नीतिमान् ) हैं। विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे हृदयमें धारण कर लीजिये ॥ १ ॥

 

[रावणने कहा-] ये दोनों मूर्ख शत्रुकी महिमा बखान रहे हैं। यहाँ कोई है? इन्हें दूर करो न! तब माल्यवान् तो घर लौट गया और विभीषणजी हाथ जोड़कर फिर कहने लगे - ॥ २ ॥

 

हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदयमें रहती हैं, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकारकी सम्पदाएँ (सुखकी स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाममें विपत्ति (दुःख) रहती है ॥ ३ ॥

 

आपके हृदयमें उलटी बुद्धि आ बसी है। इसीसे आप हितको अहित और शत्रुको मित्र मान रहे हैं। जो राक्षसकुलके लिये कालरात्रि [ के समान ] हैं, उन सीतापर आपकी बड़ी प्रीति है ॥ ४ ॥

 

                                 [दोहा ४०]

 

हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ (विनती करता हूँ कि आप मेरा दुलार रखिये (मुझ बालकके आग्रहको स्नेहपूर्वक स्वीकार कीजिये ) श्रीरामजीको सीताजी दे दीजिये, जिसमें आपका अहित न हो ॥ ४० ॥

 

विभीषणने पण्डितों, पुराणों और वेदोंद्वारा सम्मत ( अनुमोदित)\ वाणीसे नीति बखानकर कही पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला कि रे दुष्ट! अब मृत्यु तेरे निकट आ गयी है ! ॥ १ ॥

 

अरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ (अर्थात् मेरे ही अन्नसे पल रहा है), पर हे मूढ़! पक्ष तुझे शत्रुका ही अच्छा लगता है। अरे दुष्ट बता न जगत्में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओंके बलसे न जीता हो ? ॥ २ ॥

 

मेरे नगरमें रहकर प्रेम करता है तपस्वियोंपर मूर्ख ! उन्हींसे जा मिल और उन्हींको नीति बता। ऐसा कहकर रावणने उन्हें लात मारी। परन्तु छोटे भाई विभीषणने ( मारनेपर भी) बार-बार उसके चरण ही पकड़े ॥ ३ ॥

 

[शिवजी कहते हैं-] हे उमा ! संतकी यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करनेपर भी [बुराई करनेवालेकी ] भलाई ही करते हैं। [विभीषणजीने कहा-] आप मेरे पिताके समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजीको भजने में ही है ॥ ४ ॥

 

[ इतना कहकर ] विभीषण अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर आकाशमार्ग में गये और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे - ॥ ५ ॥

 

[दोहा ४१]

 

[हे रावण!] तुम्हारी सभा कालके वश है। अतः मैं अब श्रीरघुवीरकी शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना ॥ ४१ ॥

 

ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गये (उनकी मृत्यु निश्चित हो गयी ) । [ शिवजी कहते हैं-] हे भवानी! साधुका अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण कल्याणकी हानि (नाश) कर देता है ॥ १ ॥

 

रावणने जिस क्षण विभीषणको त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव (ऐश्वर्य) से हीन हो गया। विभीषणजी हर्षित होकर मनमें अनेकों मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥ २ ॥

 

[वे सोचते जाते थे— ] मैं जाकर भगवान्के कोमल औ लाल वर्णके सुन्दर चरणकमलोंके दर्शन करूँगा, जो सेवकोंक सुख देनेवाले हैं, जिन चरणोंका स्पर्श पाकर ऋषिपत्नी अहल्य तर गयीं और जो दण्डकवनको पवित्र करनेवाले हैं ॥ ३ ॥

 

जिन चरणोंको जानकीजीने हृदयमें धारण कर रखा है, जो  कपटमृगके साथ पृथ्वीपर [उसे पकड़नेको] दौड़े थे और ज‍ चरणकमल साक्षात् शिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें विराजते है मेरा अहोभाग्य है कि उन्हींको आज मैं देखूँगा ॥ ४ ॥

 

                                 [दोहा ४२]

 

जिन चरणोंकी पादुकाओंमें भरतजीने अपना मन लगा रख है, अहा ! आज मैं उन्हीं चरणोंको अभी जाकर इन नेत्रों देखूँगा ॥ ४२ ॥

 

इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्र इस पार ( जिधर श्रीरामचन्द्रजीकी सेना थी) आ गये। वानरों विभीषणको आते देखा तो उन्होंने जाना कि शत्रुका कोई खास दूत है ॥ १ ॥

 

उन्हें [पहरेपर ] ठहराकर वे सुग्रीवके पास आये और उनक सब समाचार कह सुनाये सुग्रीवने [श्रीरामजीके पास जाकर कहा- हे रघुनाथजी ! सुनिये, रावणका भाई [आपसे] मिल आया है ॥ २ ॥

 

प्रभु श्रीरामजीने कहा- हे मित्र ! तुम क्या समझते हो (तुम्हारी क्या राय है ) ? वानरराज सुग्रीवने कहा- हे महाराज सुनिये, राक्षसोंकी माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रू बदलनेवाला (छली) न जाने किस कारण आया है ॥ ३ ॥

 

 

[जान पड़ता है] यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है। इसलिये मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाय। [श्रीरामजीने कहा-] हे मित्र ! तुमने नीति तो अच्छी विचारी । परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागतके भयको हर लेना ! ॥ ४ ॥

 

प्रभुके वचन सुनकर हनुमानजी हर्षित हुए [ और मन-ही- मन कहने लगे कि ] भगवान् कैसे शरणागतवत्सल (शरणमें आये हुएपर पिताकी भाँति प्रेम करनेवाले) हैं ॥ ५ ॥

 

                                 [दोहा ४३]

 

[ श्रीरामजी फिर बोले-] जो मनुष्य अपने अहितका अनुमान करके शरणमें आये हुएका त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) है, पापमय हैं; उन्हें देखनेमें भी हानि है (पाप लगता है) ॥ ४३ ॥

 

जिसे करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्या लगी हो, शरणमें आनेपर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १ ॥

 

पापीका यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता। यदि वह (रावणका भाई) निश्चय ही दुष्ट हृदयका होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था ? ॥ २ ॥

 

जो मनुष्य निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल छिद्र नहीं सुहाते यदि उसे रावणने भेद लेनेको भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपनेको कुछ भी भय या हानि नहीं है ॥ ३ ॥

 

क्योंकि हे सखे! जगत्में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभरमें उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत होकर मेरे शरण आया है तो मैं उसे प्राणोंकी तरह रखूँगा ॥ ४ ॥

 

                                                               [दोहा ४४]

 

 

कृपाके धाम श्रीरामजीने हँसकर कहा- दोनों ही स्थितियों में उसे ले आओ। तब अंगद और हनुमान्सहित सुग्रीवजी 'कृपालु श्रीरामकी जय हो' कहते हुए चले ॥ ४४ ॥

 

विभीषणजीको आदरसहित आगे करके वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करुणाकी खान श्रीरघुनाथजी थे नेत्रोंको आनन्दका दान देनेवाले ( अत्यन्त सुखद ) दोनों भाइयों को विभीषणजीने रही से देखा ॥ १

 

फिर शोभाके धाम श्रीरामजीको देखकर वे पलक [मारना] रोककर ठिठककर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गये। भगवान्‌की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमलके समान नेत्र हैं और शरणागतके भयका नाश करनेवाला साँवला शरीर है ॥ २ ॥

 

सिंहके से कंधे हैं, विशाल वक्षःस्थल (चौड़ी छाती ) अत्यन्त शोभा दे रहा है। असंख्य कामदेवोंके मनको मोहित करनेवाला मुख है। भगवान्के स्वरूपको देखकर विभीषणजीके नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। फिर मनमें धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे ॥ ३ ॥

 

हे नाथ! मैं दशमुख रावणका भाई हूँ। हे देवताओंके रक्षक! मेरा जन्म राक्षसकुलमें हुआ है मेरा तामसी शरीर है, स्वभावसे ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लूको अन्धकारपर सहज स्नेह होता है ॥ ४ ॥

 

                                                             [दोहा ४५]

 

मैं कानोंसे आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव (जन्म-मरण) के भयका नाश करनेवाले हैं। हे दुःखियोंके दुःख दूर करनेवाले और शरणागतको सुख देनेवाले श्रीरघुवीर ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥ ४५ ॥

 

प्रभु ने उन्हें ऐसा कहकर दण्डवत् करते देखा तो वे अत्यन्त हर्षित होकर तुरंत उठे। विभीषणजीके दीन वचन सुननेपर प्रभुके मनको बहुत ही भाये। उन्होंने अपनी विशाल भुजाओंसे पकड़कर उनको हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥

 

छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर श्रीरामजी भक्तोंके भयको हरनेवाले वचन बोले- हे लंकेश ! परिवारसहित अपनी कुशल कहो तुम्हारा निवास बुरी जगहपर है ॥ २ ॥

 

दिन-रात दुष्टोंकी मण्डलीमें बसते हो। [ ऐसी दशामें] हे सखे! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है? मैं तुम्हारी सब रीति (आचार-व्यवहार) जानता हूँ। तुम अत्यन्त नीतिनिपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं सुहाती ॥ ३ ॥

 

हे तात! नरकमें रहना वरं अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्टका संग [कभी] न दे। [विभीषणजीने कहा-] हे रघुनाथजी ! अब आपके चरणोंका दर्शन कर कुशलसे हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझपर दया की है ॥ ४ ॥

 

                                                                 [दोहा ४६]

 

तब तक जीवकी कुशल नहीं और न स्वप्रमें भी उसके मनको शान्ति है, जबतक वह शोकके घर काम (विषय- कामना) को छोड़कर श्रीरामजीको नहीं भजता ॥ ४६ ॥

 

लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभीतक हृदयमें बसते हैं, जबतक कि धनुष-बाण और कमरमें तरकस धारण किये हुए श्रीरघुनाथजी हृदयमें नहीं बसते ॥ १ ॥

 

ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओंको सुख देनेवाली है। वह (ममतारूपी रात्रि) तभीतक जीवके मनमें बसती है, जबतक प्रभु (आप) का प्रतापरूपी सूर्य उदय नहीं होता ॥ २ ॥

 

हे श्रीरामजी ! आपके चरणारविन्दके दर्शन कर अब मैं कुशलसे हूँ, मेरे भारी भय मिट गये हे कृपालु ! आप जिसपर अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकारके भवशूल (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप) नहीं व्यापते ॥ ३ ॥

 

मैं अत्यन्त नीच स्वभावका राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियोंके भी ध्यानमें नहीं आता, उन प्रभुने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदयसे लगा लिया ॥ ४ ॥

 

[दोहा ४७]

 

हे कृपा और सुखके पुञ्ज श्रीरामजी मेरा अत्यन्त असीम सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और शिवजीके द्वारा सेवित युगल चरणकमलोंको अपने नेत्रोंसे देखा ॥ ४७ ॥

 

[श्रीरामजीने कहा—] हे सखा ! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि शिवजी और पार्वतीजी भी जानती हैं। कोई मनुष्य [सम्पूर्ण] जड चेतन जगत्का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाय ॥ १ ॥

 

और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधुके समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार - ॥ २ ॥

 

इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष, शोक और भय नहीं है ॥ ३ ॥

 

ऐसा सज्जन मेरे हृदयमें कैसे बसता है, जैसे लोभीके हृदयमें धन बसा करता है। तुम सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। मैं और किसीके निहोरेसे (कृतज्ञतावश ) देह धारण नहीं करता ॥ ४ ॥

 

[दोहा ४८]

 

जो सगुण (साकार) भगवान्‌के उपासक हैं, दूसरेके हितमें लगे रहते हैं, नीति और नियमोंमें दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणोंक समान हैं ॥ ४८ ॥

 

हे लङ्कापति ! सुनो, तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय हो। श्रीरामजीके वचन सुनकर सब वानरोंके समूह कहने लगे- कृपाके समूह श्रीरामजीकी जय हो ! ॥ १ ॥

 

प्रभुकी वाणी सुनते हैं और उसे कानोंके लिये अमृत जानकर विभीषणजी अघाते नहीं हैं। वे बार-बार श्रीरामजीके चरणकमलोंको पकड़ते हैं अपार प्रेम है, हृदयमें समाता नहीं है ॥ २ ॥

 

[विभीषणजीने कहा-] हे देव! हे चराचर जगत्के स्वामी ! हे शरणागतके रक्षक! हे सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले ! सुनिये, मेरे हृदयमें पहले कुछ वासना थी, वह प्रभुके चरणोंकी प्रीतिरूपी नदीमें बह गयी ॥ ३ ॥

 

अब तो हे कृपालु ! शिवजीके मनको सदैव प्रिय लगनेवाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामजीने तुरंत ही समुद्रका जल माँगा ॥ ४ ॥

 

[और कहा-] हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगत्में मेरा दर्शन अमोघ है ( वह निष्फल नहीं जाता ) । ऐसा कहकर श्रीरामजीने उनको राजतिलक कर दिया। आकाशसे पुष्पोंकी अपार वृष्टि हुई ॥ ५ ॥

 

[दोहा ४९ ( क )]

 

श्रीरामजीने रावणके क्रोधरूपी अग्निमें जो अपनी (विभीषणकी) श्वास (वचन) रूपी पवनसे प्रचण्ड हो रही थी, जलते हुए विभीषणको बचा लिया और उसे अखण्ड राज्य दिया । ४९ (क) ।

 

[दोहा ४९ (ख)]

 

शिवजीने जो सम्पत्ति रावणको दसों सिरोंकी बलि देनेपर दी थी, वही सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीने विभीषणको बहुत सकुचते हुए दी ॥ ४९ (ख) ॥

 

ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो मनुष्य दूसरेको भजते हैं, वे बिना सींग- पूँछके पशु हैं अपना सेवक जानकर विभीषणको श्रीरामजीने अपना लिया। प्रभुका स्वभाव वानरकुलके मनको [ बहुत] भाया ॥ १ ॥

 

फिर सब कुछ जाननेवाले, सबके हृदयमें बसनेवाले, सर्वरूप (सब रूपों में प्रकट), सबसे रहित, उदासीन, कारणसे (भक्तोंपर कृपा करनेके लिये) मनुष्य बने हुए तथा राक्षसोंके कुलका नाश करनेवाले श्रीरामजी नीतिकी रक्षा करनेवाले वचन बोले- ॥ २ ॥

 

हे वीर वानरराज सुग्रीव और लङ्कापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्रको किस प्रकार पार किया जाय ? अनेक जातिके मगर, साँप और मछलियोंसे भरा हुआ यह अत्यन्त अथाह समुद्र पार करनेमें सब प्रकारसे कठिन है ॥ ३ ॥

 

विभीषणजीने कहा- हे रघुनाथजी सुनिये यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रोंको सोखनेवाला है (सोख सकता है), तथापि नीति ऐसी कही गयी है (उचित यह होगा ) कि [पहले] जाकर समुद्रसे प्रार्थना की जाय ॥ ४ ॥

 

[दोहा ५०]

 

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि । बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ॥ हे प्रभु! समुद्र आपके कुलमें बड़े (पूर्वज) हैं, वे विचारकर उपाय बतला देंगे तब रीछ और वानरोंकी सारी सेना बिना ही परिश्रमके समुद्रके पार उतर जायगी ॥ ५० ॥

 

[ श्रीरामजीने कहा-] हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया। यही किया जाय, यदि दैव सहायक हों। यह सलाह लक्ष्मणजीके मनको अच्छी नहीं लगी श्रीरामजीके वचन सुनकर तो उन्होंने बहुत ही दुःख पाया ॥ १ ॥

 

[लक्ष्मणजीने कहा-] हे नाथ! दैवका कौन भरोसा ! मनमें क्रोध कीजिये ( ले आइये ) और समुद्रको सुखा डालिये। यह दैव तो कायरके मनका एक आधार ( तसल्ली देनेका उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं ॥ २ ॥

 

यह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले-ऐसे ही करेंगे, मनमें धीरज रखो। ऐसा कहकर छोटे भाईको समझाकर प्रभु श्रीरघुनाथजी समुद्रके समीप गये ॥ ३ ॥

 

उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया। फिर किनारेपर कुश बिछाकर बैठ गये। इधर ज्यों ही विभीषणजी प्रभुके पास आये थे, त्यों ही रावणने उनके पीछे दूत भेजे थे ॥ ४ ॥

 

[दोहा ५१]

 

कपटसे वानरका शरीर धारणकर उन्होंने सब लीलाएँ देखीं। वे अपने हृदयमें प्रभुके गुणोंकी और शरणागतपर उनके स्नेहकी सराहना करने लगे ॥ ५१ ॥

 

फिर वे प्रकटरूपमें भी अत्यन्त प्रेमके साथ श्रीरामजीके स्वभावकी बड़ाई करने लगे, उन्हें दुराव (कपट वेष) भूल गया! तब वानरोंने जाना कि ये शत्रुके दूत हैं और वे उन सबको बाँधकर सुग्रीवके पास ले आये ॥ १ ॥

 

सुग्रीवने कहा- सब वानरो! सुनो, राक्षसोंके अङ्ग भङ्ग करके भेज दो। सुग्रीवके वचन सुनकर वानर दौड़े। दूतोंको बाँधकर उन्होंने सेनाके चारों ओर घुमाया ॥ २ ॥

 

वानर उन्हें बहुत तरहसे मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते थे, फिर भी वानरोंने उन्हें नहीं छोड़ा। [तब दूतोंने पुकारकर कहा-] जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश श्रीरामजीकी सौगंध है ॥ ३ ॥

 

यह सुनकर लक्ष्मणजीने सबको निकट बुलाया। उन्हें बड़ी दया लगी, इससे हँसकर उन्होंने राक्षसोंको तुरंत ही छुड़ा दिया। [ और उनसे कहा-] रावणके हाथमें यह चिट्ठी देना [और कहना ] हे कुलघातक ! लक्ष्मणके शब्दों (सँदेसे) को बाँचो ॥ ४ ॥

 

[दोहा ५२]

 

फिर उस मूर्खसे जवानी यह मेरा उदार (कृपासे भरा हुआ) सन्देश कहना कि सीताजीको देकर उनसे (श्रीरामजीसे) मिलो, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया [समझो ] ॥५२॥

 

लक्ष्मणजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर, श्रीरामजीके गुणोंकी कथा वर्णन करते हुए दूत तुरंत ही चल दिये। श्रीरामजीका यश कहते हुए वे लङ्कामें आये और उन्होंने रावणके चरणोंमें सिर नवाये ॥ १ ॥

 

दशमुख रावण ने हँसकर बात पूछी- अरे शुक! अपनी कुशल क्यों नहीं कहता ? फिर उस विभीषणका समाचार सुना, मृत्यु जिसके अत्यन्त निकट आ गयी है॥ २ ॥

 

मूर्खने राज्य करते हुए लङ्काको त्याग दिया। अभागा अब जौका कीड़ा (घुन) बनेगा (जौके साथ जैसे घुन भी पिस जाता है, वैसे ही नरवानरोंके साथ वह भी मारा जायगा ); फिर भालु और वानरोंकी सेनाका हाल कह, जो कठिन कालकी प्रेरणासे यहाँ चली आयी है ॥ ३ ॥

 

और जिनके जीवनका रक्षक कोमल चित्तवाला बेचारा समुद्र बन गया है (अर्थात् उनके और राक्षसोंके बीचमें यदि समुद्र न होता तो अबतक राक्षस उन्हें मारकर खा गये होते)। फिर उन तपस्वियोंकी बात बता, जिनके हृदयमें मेरा बड़ा डर है ॥ ४ ॥

 

            [दोहा ५३]

 

उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानोंसे मेरा सुयश सुनकर ही लौट गये? शत्रुसेनाका तेज और बल बताता क्यों नहीं ? तेरा चित्त बहुत ही चकित (भौंचक्का-सा ) हो रहा है ॥ ५३ ॥

 

[दूतने कहा-] हे नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिये ( मेरी बातपर विश्वास कीजिये)। जब आपका छोटा भाई श्रीरामजीसे जाकर मिला, तब उसके पहुँचते ही श्रीरामजीने उसको राजतिलक कर दिया ॥ १ ॥

 

हम रावणके दूत हैं, यह कानोंसे सुनकर वानरोंने हमें बाँधकर बहुत कष्ट दिये, यहाँतक कि वे हमारे कान-नाक काटने लगे। श्रीरामजीकी शपथ दिलानेपर कहीं उन्होंने हमको छोड़ा ॥ २ ॥

 

हे नाथ! आपने श्रीरामजीकी सेना पूछी सो वह तो साँ करोड़ मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। अनेकों रंगोंके भालु और वानरोंकी सेना है, जो भयंकर मुखवाले, विशाल शरीरवाले और भयानक हैं ॥ ३ ॥

 

जिसने नगरको जलाया और आपके पुत्र अक्षयकुमारको मारा, उसका बल तो सब वानरोंमें थोड़ा है असंख्य नामोंवाले बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा हैं। उनमें असंख्य हाथियोंका बल है और वे बड़े ही विशाल हैं ॥ ४ ॥

 

[दोहा ५४]

 

द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद गद विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान्- ये सभी बलकी राशि हैं ॥ ५४ ॥

 

ये सब वानर बलमें सुग्रीवके समान हैं और इनके जैसे [ एक-दो नहीं] करोड़ों हैं, उन बहुत-सोंको गिन ही कौन सकता है? श्रीरामजीकी कृपासे उनमें अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकोंको तृणके समान [तुच्छ] समझते हैं ॥ १ ॥

 

हे दशग्रीव! मैंने कानोंसे ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरोंके सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेनामें ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रणमें न जीत सके ॥ २ ॥

 

सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे हाथ मीजते हैं पर श्रीरघुनाथजी उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम मछलियों और साँपोंसहित समुद्रको सोख लेंगे। नहीं तो बड़े-बड़े पर्वतोंसे उसे भरकर पूर (पाट) देंगे ॥ ३ ॥

 

और रावणको मसलकर धूलमें मिला देंगे सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। सब सहज ही निडर हैं; इस प्रकार गरजते और डपटते हैं मानो लङ्काको निगल ही जाना चाहते हैं ॥ ४ ॥

 

[दोहा ५५]

 

सब वानर भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिरपर प्रभु (सर्वेश्वर) श्रीरामजी हैं। हे रावण! वे संग्राममें करोड़ों कालोंको जीत सकते हैं ॥ ५५ ॥

 

श्रीरामचन्द्रजीके तेज (सामर्थ्य), बल और बुद्धिकी अधिकताको लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाणसे सैकड़ों समुद्रोंको सोख सकते हैं, परन्तु नीतिनिपुण श्रीरामजीने [नीतिकी रक्षाके लिये] आपके भाईसे उपाय पूछा ॥ १ ॥

 

उनके (आपके भाईके) वचन सुनकर वे (श्रीरामजी) समुद्रसे राह माँग रहे हैं, उनके मनमें कृपा भरी है [ इसलिये वे उसे सोखते नहीं]। दूतके ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा [ और बोला- ] जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरोंको सहायक बनाया है ॥ २ ॥

 

स्वाभाविक ही डरपोक विभीषणके वचनको प्रमाण करके उन्होंने समुद्रसे मचलना (बालहठ ) ठाना है। अरे मूर्ख ! झूटी बड़ाई क्या करता है! बस, मैंने शत्रु (राम) के बल और बुद्धिकी थाह पा ली ॥ ३ ॥

 

जिसके विभीषण-जैसा डरपोक मन्त्री हो, उसे जगत्‌में विजय और विभूति (ऐश्वर्य) कहाँ ? दुष्ट रावणके वचन सुनकर दूतको क्रोध बढ़ आया। उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली ॥ ४ ॥

 

[ और कहा-] श्रीरामजीके छोटे भाई लक्ष्मणने यह पत्रिका दी है। हे नाथ! इसे बचवाकर छाती ठंडी कीजिये। रावणने हँसकर उसे बायें हाथसे लिया और मन्त्रीको बुलवाकर वह मूर्ख उसे बाचने लगा ॥ ५ ॥

 

                                                                           [दोहा ५६ ( ख ) ]

 

प्रभुके चरण-कमलोंका भ्रमर बन जा अथवा रे दुष्ट! श्रीरामजीके बाणरूपी अग्निमें परिवारसहित पतिंगा हो जा ( दोनोंमेंसे जो अच्छा लगे सो कर ) ॥ ५६ (ख) ॥

 

पत्रिका सुनते ही रावण मनमें भयभीत हो गया, परन्तु मुखसे (ऊपरसे ) मुसकराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा- जैसे कोई पृथ्वीपर पड़ा हुआ हाथसे आकाशको पकड़नेकी चेष्टा करता हो, वैसे ही यह छोटा तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास करता है ( डींग हाँकता है ) ॥ १ ॥

 

शुक (दूत) ने कहा- हे नाथ! अभिमानी स्वभावको छोड़कर [ इस पत्रमें लिखी] सब बातोंको सत्य समझिये क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिये। हे नाथ! श्रीरामजीसे वैर त्याग दीजिये ॥ २ ॥

 

यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोकोंके स्वामी हैं, पर उनका स्वभाव अत्यन्त ही कोमल हैं। मिलते ही प्रभु आपपर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदयमें नहीं रखेंगे ॥ ३ ॥

 

 

जानकीजी श्रीरघुनाथजीको दे दीजिये। हे प्रभु! इतना कहना मेरा कीजिये। जब उस (दूत) ने जानकीजीको देनेके लिये कहा, तब दुष्ट रावणने उसको लात मारी॥ ४ ॥

 

वह भी [विभीषणकी भाँति] चरणोंमें सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर श्रीपानी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनायी और श्रीरामजीकी कृपासे अपनी गति ( मुनिका स्वरूप) पायी ॥ ५ ॥

 

(शिवजी कहते हैं -) हे भवानी वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषिके शापसे राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रमको चला गया ॥ ६ ॥

 

                                 [दोहा ५७]

 

इधर तीन दिन बीत गये, किन्तु जड समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्रीरामजी क्रोधसहित बोले- बिना भयके प्रीति नहीं होती ! ॥ ५७ ॥

 

हे लक्ष्मण ! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निवाणसे समुद्रको सोख डालूँ। मूर्खसे विनय कुटिलके साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूससे सुन्दर नीति (उदारताका उपदेश ) ॥ १ ॥

 

वैराग्य का वर्णन, क्रोधीसे शम (शान्ति) की बात और कामीसे भगवान्‌की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसरमें बीज बोनेसे होता है (अर्थात् ऊसरमें बीज बोनेकी भाँति यह सब व्यर्थ जाता है) ॥ २ ॥

 

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने धनुष चढ़ाया यह मत लक्ष्मणजीके मनको बहुत अच्छा लगा। प्रभुने भयानक [अग्नि] बाण सन्धान किया, जिससे समुद्रके हृदयके अंदर अग्रिकी ज्वाला उठी ॥ ३ ॥

 

मगर, साँप तथा मछलियोंके समूह व्याकुल हो गये। जब समुद्रने जीवोंको जलते जाना, तब सोनेके थालमें अनेक मणियों ( रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मणके रूपमें आया ॥ ४ ॥

 

                                 [दोहा ५८]

 

काहिं पड़ कदरी फरड़ कोटि जतन कोड सींच। बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पड़ नव नीच ॥ [काकभुशुण्डिजी कहते हैं-] हे गरुड़जी! सुनिये, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटनेपर ही फलता है। नीच विनयसे नहीं मानता, वह डाँटनेपर ही झुकता है ( रास्तेपर आता है ) ॥ ५८ ॥

 

समुद्रने भयभीत होकर प्रभुके चरण पकड़कर कहा - हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभावसे ही जड है ॥ १ ॥

 

आपकी प्रेरणासे मायाने इन्हें सृष्टिके लिये उत्पन्न किया है, सब ग्रन्थोंने यही गाया है। जिसके लिये स्वामीकी जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकारसे रहनेमें सुख पाता है॥ २ ॥

 

प्रभुने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दण्ड) दी किन्तु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षाके अधिकारी हैं ॥ ३ ॥

 

प्रभुके प्रतापसे मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी )। तथापि प्रभुकी आज्ञा अपेल है (अर्थात् आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ ॥ ४ ॥

 

                                 [दोहा ५९]

 

समुद्रके अत्यन्त विनीत वचन सुनकर कृपालु श्रीरामजीने मुसकराकर कहा- हे तात! जिस प्रकार वानरोंकी सेना पार उतर जाय, वह उपाय बताओ ॥ ५९ ॥

 

[समुद्रने कहा-] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपनमें ऋषिसे आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेनेसे ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रतापसे समुद्रपर तैर जायेंगे ॥ १ ॥

 

मैं भी प्रभुकी प्रभुताको हृदयमें धारण कर अपने बलके अनुसार (जहाँतक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्रको बँधाइये, जिससे तीनों लोकोंमें आपका सुन्दर यश गाया

 

इस बाणसे मेरे उत्तर तटपर रहनेवाले पापके राशि दुष्ट मनुष्योंका वध कीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामजीने समुद्रके मनकी पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात् बाणसे उन दुष्टोंका वध कर दिया ) ॥ ३ ॥

 

श्रीरामजीका भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह सुनाया। फिर चरणोंकी वन्दना करके समुद्र चला गया ॥ ४ ॥

 

[छन्द]

 

समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत ( उसकी सलाह) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुगके पापोंको हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है। श्रीरघुनाथजीके गुणसमूह सुखके धाम, सन्देहका नाश करनेवाले और विषादका दमन करनेवाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसारका सब आशा भरोसा त्यागकर निरन्तर इन्हें गा और सुन।

 

                                                                           [दोहा ६०]

 

श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंका देनेवाला है जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागरको तर जायेंगे ॥ ६० ॥

 

 

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः ॥




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